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पुस में नूतन बर्ष

 पुस में नूतन वर्ष मनाना,  फिरंगी का वार हैं ये।  पश्चिम को पुरब में लाने,  का समझो हथियार हैं ये।  तुम कहते हो स्वागत कर ले पर हम पे धिक्कार हैं ये।  गोरो का त्योहार मनाना,  खूनी का सत्कार हैं ये।  भूल गये उनकी बर्बरता,  भूल गये क्यों फांसी को।  भूल गये क्यों रणचंडी को,  खोयी जिसने झाँसी को।  मूढ़ हैं जो पश्चिम में डूब के  भूले, मथुरा, कासी को।  हम हैं गदर के भटके राही,  उचित नहीं व्यवहार हैं ये।  तुम चाहो तो रंग बदल लो,  मेरा सच्चा प्यार हैं ये।  पुस में नूतन वर्ष मनाना,  मुझको न स्वीकार हैं ये।  फिरंगी नव वर्ष मनाना,  खूनी का सत्कार हैं ये।।    कवि:- अनिल कुमार मंडल

पर्व आज़ादी का

  हैं पर्व अज़ादी का, हर घर में तिरंगा हो। २ उत्तर का हिम चोटी,२ उदयाचल,बंगा हो। हैं पर्व अज़ादी का, चहु और तिरंगा हो।  सौराष्ट्र हो पश्चिम का,२ या जलधि तरंगा हो हैं पर्व अज़ादी का,हर दिशा तिरंगा हो। (पंजाब हो द्रविड़ हो, पुरब का कलिंगा हो। हैं पर्व आज़ादी का हर घर में तिरंगा हो। दक्षिण का दक्कन हो २ या कंचनजंघा हो। हैं पर्व अज़ादी का, हर दिशा तिरंगा हो। ) अंबर हो धरती हो,२ या उड़ती पतंगा हो है पर्व आज़ादी का , इस रंग में रंगा हो हैं पर्व अज़ादी का,हर घर में तिरंगा हो। सब पाये भात यहाँ,२ हर तन पे अंगा हो। हैं पर्व अज़ादी का,हर घर में तिरंगा हो। जीते जी छत सबको,२ मरने पे गंगा हो। हैं पर्व अज़ादी का,हर घर में तिरंगा हो। आपस में प्रीत रहे,२ झगडा न दंगा हो। हैं पर्व अज़ादी का,हर घर में तिरंगा हो। न जाति का हो च्चकर,२ न धर्म का पंगा हो हैं पर्व अज़ादी का,हर घर में तिरंगा हो। सच की हो जीत यहाँ,बस न्याय न धंधा हो हैं पर्व आज़ादी का हर घर में तिरंगा हो। सर्वे शन्तु सुखिनः, २ हर इंसा चंगा हो। हैं पर्व अज़ादी का,हर घर में तिरंगा हो। २     ...

देख तेरे संसार की हालत

  देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान। कितना बदल गया युवान,२ भूख न बदली,प्यास न बदला, बदल गया जलपान, कितना बदल गया युवान २ पिज़्ज़ा,बर्गर,ठंढा पेय पी, बेच रहा ईमान। कितना बदल गया युवान २ अंग्रेज गया न गई अंग्रेजी, खाना सिखा गये काट कलेजी। कही मोबाइल हैं,कही पे टी वी, लड़ना सिख गई हर बीबी। आज बेटी से बाप दुःखी, करते जो कन्यादान। कितना बदल गया युवान,२ पापा की ये परियां देखो, पहन रही हथकरिया देखो। हाथ में पोवा लेकर डोले, अंग्रेजी में गाली बोले। लोक,लाज सब छोड़ चुकी, पापा इनसे परेशान कितना बदल गया युवान २ लड़के से भी दुःखी हैं पापा, घर में पड़े पुलिसिया छापा, देश धर्म की बात न करते, आय्याशी के गर्त में पड़ते ड्रग्स और कोकीन ये लेकर, बाँटते सबको ज्ञान कितना बदल गया युवान २

जग में आने से पहले

  जग में आने से पहले सताई गई, कोख़ में टेटुऐ को दबाई गई मुझको मेरी खता का पता ही नहीं, कैचिया मेरे उपर चलाई गई। जग ने कहकर के अबला पुकारा मुझे, बोझ माना गटर में बहाई गई, मैं तो बेटी थी मुझमें सृजन थी बसी कुल का दीपक न थी सो बुझाई गई मेरी लोहित ही जब मेरे कातिल बने झूठी शोहरत में ये सब कराई गई जग में आने से पहले सताई गई लड़के उद्धार करते हैं एक कूल का मैं थी दो कूल की दीपक बुझाई गई जग में आने से पहले सताई गई, कोख़ में टेटुऐ को दबाई गई।   कवि:-अनिल कुमार अदल

इतना भी आसान नहीं

भारत  देश  में  रेल चलना, इतना भी  आसान नहीं रात- रात  भर आँखे फोडू, मिलती हैं  पहचान नहीं कई  परीक्षा,और  परीक्षण देकर  इसको  पाता  हूँ दिनचर्या  सब  उल्टी सीधी  रोग  शरीर  में लाता हूँ लघुशंका, बड़ीशंका  रोके  इसमें  तो  सम्मान  नहीं भारत  देश  में  रेल  चलना, इतना भी आसान नहीं रात - रात भर  आँखे फोडू, पाता इसका  दाम नहीं पढ़ा लिखा  मुझे  रेल न माने, उत्तरदायी सब दे डारे घर में  हम अतिथि  बन बैठे, रिश्तेदार कहे हम ऐठे कितनो से  हुई  तू- तू म्ये म्ये सरकारी मेहमान  नहीं भारत  देश  में  रेल चलना इतना  भी आसान  नहीं रात - रात  भर आँखे फोडू, मिलती हैं  पहचान नहीं कभी- कभी दुविधा में रहते,खा ले या भूखे सो जाए रोजी  रोटी  यही  हमारी, इससे  दूर  कहाँ हम  जाए पानी पी भूखे सो जाना, क्या  तन  का अपमान नहीं भारत  देश  में  रेल  चलना...

आफताब सा जलना होगा

अपनी नस्ल बचाने खातिर , आफताब सा जलना होगा मस्त पवन की रोटी खाकर, काँटों  पे अब  चलना होगा सोंचो,देखो, चिंतन  कर लो, मैं   क्यो   ऐसा   कहता   हूँ मानसिक गुलामी मे हैं भारत, लेकिन  मे  नही  सहता  हूँ एक मेरी मसबारा मानकर, इस   बेड़ी   को  तोड़ो  तुम जो  भी हो  अवरोध राह मे, उसको  भी   न   छोड़ो  तुम जुगनूओ  ने  भ्रमित किया हैं, आफताब सा जलना होगा संग ज्ञान का  दीप जलाकर सच को  बाहर  करना  होगा कुछ  बधिर भी सुनेगा हमको शंखनाद  अब  करना  होगा मानव  तन  में  जन्म लिया तो नेक  कर्म  कुछ  करना होगा सौ  तारों  के  बीच  हमे  अब आफताब  सा  जलना  होगा भय  का  जो  बाजार  खडा हैं हमको  इससे  लड़ना  होगा अपनी  नस्ल  बचाने  खातिर , आफताब  सा  जलना  होगा म...

साल बीत गया इक्कीस वाला

 साल  बीत  गया २१ वाला, २२  में  मेरा  घर  ला दो मैं हूँ लड़की टिक टोक वाली,नये दौर का वर ला दो।  दादा बाली बाग बेच दो, या फिर मुझको कर ला दो।  तुम क्या जानो नये दौर का वर कितना प्यारा होता।  माँ, बापू  को  साथ  न  रखे, टाॅमी  सा न्यारा होता।  चिड़िया  के जगने से पहले, बिस्तर  से उठ जाता वो दूध भी लाता चाय बनाता,चाय पिला कहे सो जाओ बिन कहे  झाड़ू, पौछा,करता बर्तन  खुद ही धो लेता।  भीगी बिल्ली बन जाता,आँखों में जरा असर ला दो।  ऐसा  एक जीवंत खिलौना, बापू  सुनो मगर ला  दो।  मैं हूँ लड़की टिक टोक वाली,नये दौर का वर ला दो।  साल  बीत  गया २१ वाला, २२  में  मेरा  घर  ला दो दादा बाली बाग बेच दो, या फिर मुझको कर ला दो।  हाई हिल की सैंडिल पहनू या फटी जीन्स बजारो में।  मुझको  न  वो  रोके  टोके  मैं  रहू  लाख  हज़ारो  में।  माँग मैं अपनी सुनी रखू  या मैं  तिलकित भाल...

दो जिस्म एक जान

अधरों को अधरों पर रखकर तन की अगन बुझाने दो।  दो जिस्म एक जान हुए बिन,तुम  मुझको  न जाने दो।  घडी  दो  घडी  पास आ मेरे, सांसों  को  टकराने  दो।  हाथों  का करतब  दिखलाऊ, अंग अंग तक जाने दो। केशर वाला  दूध  पिलाया, को नस -नस  में  छाने दो तुमको  बाहों  में  भर लू और  थोड़ा  मुझे सताने  दो तेरी  जवानी  बंद  कली  सी,पुष्प  इसे बन  जाने  दो।  मैं अलि हूँ मकरंद का प्यास,जी भर कर रस पाने दो। कामसूत्र  के  ग्रंथो  वाला, एक परिमेय  तो  पाने  दो।  लिप्सा  हो  दोनों  की  पूरी, ऐसा  कुछ कर  जाने दो।  एक  दूजे  को सींचे  हम तुम, बूँदों  को  बह जाने दो।  स्पंदन हो  चरम  पे और, काया  को  स्थूलता  पाने दो इसी पल को कहते हैं समाधि,क्षण भर को पा जाने दो।  अधरों  को अधरों पर रखकर,तन की अगन बुझाने दो दो  जिस्म  ए...

मुक्तक

  जिनको मैंने अपना माना वो तो संगदिल वाले थे। तन से गोरे,चिकने थे पर मन से बिल्कुल काले थे। कुछ दिन संग गुजरा हमने फिर जाकर ये जाना हैं, मैं तो ठहरा कीट- पतंगा, वो मकड़ी के जाले थे। २ दिलों जान से चाहा जिसको,उसने ही दिल तोड़ दिया। जीवन मेरा सरल,सुलभ था,उसने ही झकझोर दिया। उसके बिन जब जीना सिखा,अब उसकी दरकार नहीं उसके घरवाले ने आकर,फिर से रिश्ता जोड़ दिया। रिश्ता जोड़ा दिल नहीं जोड़ा,एक गाँठ जो बांकी थी, रिश्ता टूटने से पहले हमने भी, माँगी माफी थी। पर उसने दुत्कार दिया था,जैसे राह का कुत्ता में जीवन उनके संग चला,जो बीती वो बस झाँकी थी

गीत आज़ादी का

शिक्षा हुई मैकाले वाली,  मनोरंजन बर्बादी का।   ऐसे भारत देश में कैसे,   गाये गीत आजादी का।  भाषा हो गई इंग्लिश,विंग्लिश  भूषा रहा न खादी का।   खान पान हुआ पिज्जा,बर्गर  नुक्सा बचा न दादी का।   रीत- रिवाज भी बदल गये,   आनंद कहाँ अब शादी का।   ऐसे भारत देश में कैसे,   गाये गीत आज़ादी का।   सुबह न मिलती राग भैरवी,   शाम न किस्सा दादी का।   बहु,बेटी पे नशा चढ़ा हैं,   फिरंगी शहजादी का।   फटी जीन्स में युवा थिरकते,  ज्ञान बाटते गांधी का,  माता,पिता को चिथड़े न दे बाँटे कंब्बल चाँदी का  पंचभुत सब मैली हो गई   बुरा हाल हैं वादी का।   ऐसे भारत देश में कैसे,   गाये गीत आज़ादी का।              अनिल कुमार मंडल

कैसे देंगे आशीर्वाद

राजीव दीक्षित उन युवा को, कैसे देंगे आशीर्वाद,   आठ बजे वो बिस्तर छोड़े, बन रहे देखो राजीववाद।   दातून छोड़ ब्रश से करते, अपने दातो का उपचार,   किमकर्तव्यविमूढ ये रहते, बदल नहीं पाते हैं विचार।   राजीव भाई उन युवा को, सदबुद्धि दे करे सुधार।   पिज्जा,बर्गेर,छोड़ न पाते , बन रहे देखो राजीववाद।   राजीव दीक्षित उन युवा को, कैसे देंगे आशीर्वाद।   वही विदेशी एसिड पी के, कर रहे हैं जीवन बर्बाद,   खड़े खड़े पिये RO बोतल, अंग्रेजी में करे विवाद।   फटी जीन्स कंपनी विदेशी, इंग्लिस धुन में करते नाद।   दस लोगो के बीच खड़े हो हाके डिंग करे संवाद  स्वदेशी की माला जपते, विदेशी को करे आबाद  गौ माता का मान न करते, झूठे ऐसे राजीववाद  राजीव दीक्षित उन युवा को, कैसे देंगे आशीर्वाद,                           कवि:- अनिल कुमार मंडल

राजीव दीक्षित एक विचार

राजीव दीक्षित नाम न कोई,ये हैं एक विचार जी  उनकी बात का अमल करें,नूतन भारत तैयार जी  जिनकी वाणी दूर करे हैं युवाओं का विकार जी  जीवन का उद्देश बता गए,जीने का दिये सार जी  मानव जीवन कहते किसको,इसका क्या श्रृंगार जी  राजीव दीक्षित नाम न कोई,ये थे एक अवतार जी  स्वदेशी के प्रखर प्रवक्ता,ज्ञान के थे भंडार जी।  गौ माता की सेवा कर,हिंदी का किये प्रचार जी  कई विदेशी,बहुराष्ट्रीय का,कर गये ये संहार जी  राजीव दीक्षित नाम न कोई,ये हैं एक विचार जी  घर की रसोई से कर डाले,रोगो का उपचार जी  पंचगव्य की महिमा को माने सारा संसार जी  गौरवमय इतिहास देश का समझा गए विस्तार जी  राजीव दीक्षित नाम न कोई,ये हैं एक विचार जी  राजीव जी बैकुंठ गए पर,हृदय के छेड़े तार जी  इनके बात का अमल करे,नूतन भारत तैयार जी  दशो दिशाये में फिर गूंजे,हिन्द की जय जयकार जी  उनकी बात का अमल करे, नूतन भारत तैयार जी २                                 कवि:-अनिल कुमार मंडल...

जागो हिंद के वासी

हर घर हैं मानसिक गुलामी,इससे कैसे निकला जाए जागो हिंद के वासी जागो,इसका कोई करो उपाय।  मैकाले की शिक्षानीति,दिया हैं इसका चलन बढाय,  चिरंतन इतिहास हमारा,पर दुनिया अब आँख दिखाय।  फिरंगी छलिये थे आये,भारत में गये लूट मचाये।  हमने दी थी जग को शिक्षा,चाल फिरंगी समझ न पाये जागो हिंद के वासी जागो,इसका कोई करो उपाय।  अपने पुरखे वेद,सनातन,अतिथियों को गले लगाय।  फिर उनकी काली करनी को,क्षमादान कर खुशियाँ पाए।  पुरखो की दो यही कमजोरी,गारो का दिया दास बनाय।  गये अंग्रेज न गई अंग्रेजी,निति अपनी गया बनाया।  शर्ते पर दी हमें आज़ादी,जो गोरो के मन को भाये।  सत्ता के भूखे लोगों से,समझौता गोरे कर आये।  समझौता था आधी रात का,तथाकथित आज़ादी पाये।  एक कंपनी गई देश से,सेकड़ो ने लिया पेठ जामय।  फूट डालकर शासन कर गये,धंधा अपना लिया जमाय।  जागो हिंद के वासी जागो,इसका कोई करो उपाय।  हर घर हैं मानसिक गुलामी,इससे कैसे निकला जाय।  थोड़ा जो स्वाभिमान बचा था,मीडिया ने दिया उसे भुनाय जाहिरात झूठे दिखलाकर,धंधा अपना खूब बढाय।  सोने की चिड...

देश ये बिकने वाला हैं

शुरू करे एक समर देश में,देश ये बिकने वाला हैं।  जहाँ देखिये वही शहर में,हो रहा जलियावाला हैं।  युवाओं पर लाठी चलती,देश का जो रखवाला हैं।  बच्चों को शिक्षा नहीं मिलती,विद्यालय पर ताला हैं। सड़क पे हलधर रौंदे जाते, रोटी जो लाने वाला हैं।  शुरु करें एक समर देश में,देश ये बिकने वाला हैं।  महिलाएं भी नहीं सुरक्षित,मुंसिफ का मन काला हैं।  बचा खुछा शकुनि का पाशा,नाश कराने वाला हैं।  हरेक हाथ में दे दिया पाशा,डाटा जियो वाला हैं।  फिर ऐसे मैं युवा दुर्योधन,जैसा ही मतवाला हैं।  शुरु करे एक समर देश में,देश ये बिकने वाला हैं।  गाड़ी अपनी लंदन वाली,जिसमें ईंधन काला हैं।  हमको गुलामी में ये रखे,न्याय न मिलने वाला हैं।  चाहे कितनों चालक बदलो,देश न बढ़ने वाला हैं।  संपूर्ण व्यवस्था हो परिवर्तन,फिर कुछ होने वाला हैं।  शुरु करे एक समर देश में,देश ये बिकने वाला हैं।  मोदी,योगी सभी विवश हैं,विश्व व्यापी घोटाला हैं।  कुछ शर्तो पर मिली आजादी,जिसने ये कर डाला हैं।  गोरों की बड़ी लंबी साजिश,खंड खंड कर डाला हैं। शुरू करें एक सम...

कितना बदल गया युवान

 देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान।  कितना बदल गया युवान,कितना बदल गया युवान।  भूख न बदली,प्यास न बदला,बदल गया जलपान,  कितना बदल गया युवान, कितना बदल गया युवान।  पिज़्ज़ा,बर्गर,ठंढा पेय पी,बेच रहा ईमान।  कितना बदल गया युवान,कितना बदल गया युवान। अंग्रेज गया न गई अंग्रेजी,खाना सिखा गये काट कलेजी।  कही मोबाइल हैं,कही पे टी वी,लड़ना सिख गई हर बीबी।  आज बेटी से बाप दुःखी,करते जो कन्यादान।  कितना बदल गया युवान,कितना बदल गया युवान पापा की ये परियां देखो,पहन रही हथकरिया देखो। हाथ में पोवा लेकर डोले,अंग्रेजी में गाली बोले।  लोक,लाज सब छोड़ चुकी,पापा इनसे परेशान कितना बदल गया युवान, कितना बदल गया युवान लड़के से भी दुःखी हैं पापा,घर में पड़े पुलिसिया छापा।  देश धर्म की बात न करते,आय्याशी के गर्त में पड़ते।  ड्रग्स और कोकीन ये लेते,पुरखों की ये शान डुबोते।  इनकी काली करनी से ये मुल्क बना हैं मशान कितना बदल गया युवान, कितना बदल गया युवान। 

बाबुल का घर छोड़ू कैसे

  बाबूल का घर छोडू कैसे,मुझसे कह दो मेरे सजन जिस मिट्टी मे बचपन बीता,जहा बनी थी मै दुल्हन पहला निवाला जहा का खाया,जहा से पाया था जीवन जिस माता ने क्षीर पिलाई,हो न उस हीय का भेदन उस बापू का दिल टूटेगा,किये हैं जिसने लाख जतन बाबूल का घर छोडू कैसे , मुझसे कह दो मेरे सजन जिस मिट्टी मे बचपन बीता,जहा बनी थी मै दुल्हन बचपन की गुड्डे की शादी,वो तितली वो ठंडी पवन रेतो पे वो घर बनवाना,जो दिखता था राज भवन भैया संग पतंगे उड़ाना,सखियो का खाना जूठन जिस दहलीज पे बाबा पुकारे,बात-बात पे सुन कंचन बाबूल का घर छोडू कैसे,मुझसे कह दो मेरे सजन जिस मिट्टी मे बचपन बीता,जहा बनी थी मै दुल्हन वो बचपन की सखी-सहेली,सबके अब हो गये लगन दाता का ये क्या विधान हैं,प्रीत होता यहाँ गबन बापू का घर छोड़ सजन में बन गई अब तेरी जोगन इस घर की हैं लाल चुनरिया,तेरे घर का होगा कफन बाबूल का घर छोडू कैसे,मुझसे कह दो मेरे सजन जिस मिट्टी मे बचपन बीता,जहा बनी थी मै दुल्हन                            ...

बुलेट ट्रेन

बुलेट ट्रेन में कौन चढ़े जब,पेट मे लग रही आग हैं। अपना हैं चीथड़ों से गुजारा,गिनती के सरताज हैं। बुंदे टपक रही हैं छतों से, रोटी को मोहताज हैं। बुलेट ट्रेन में कौन चढ़े जब,पेट मे लग रही आग हैं। ये उनको अच्छा लगता हैं,जहाँ पे चीन जापान हैं। अपने यहाँ तो हर एक चौक पे,मिलता पाकिस्तान है। बेकारी बढ़ती ही जा रही, हलधर पे भी दाग हैं। बुलेट ट्रेन में कौन चढ़े जब,पेट मे लग रही आग हैं। व्यपारी भी लुटा पड़ा हैं,दुःख से सब बेहाल हैं। उसपे बढ़ गया कहर कोरोना,मौत का दिखता जाल है। रोटी, कपड़ा और मकान दो, पहले इनसे लाग हैं। बुलेट ट्रेन में कौन चढ़े जब,पेट मे लग रही आग हैं।                              अनिल कुमार मंडल                           रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

सबसे बड़ा हैं झूठ

सबसे बड़ा हैं झूठ जगत का,हमको मिली आजादी हैं। सच-सच क्यो नहीं कहते साहब,देश की ये बर्बादी है। गोरों के दिये बहुविधान से, लूट अभी तक जारी हैं। सत्ता का जब लेन-देन हुआ, लग गई नई बिमारी हैं। पहले गोरे-गोरे लुटेरे, ज्यादातर अब खादी है। सच-सच क्यो नही कहते साहब,देश की ये बर्बादी हैं। सबसे बड़ा हैं झूठ जगत का,हमको मिली आजादी हैं। आधी रात का समझौता ,गोरों ने दिया स्वराज था। सत्ता के भूखे लोगों ने, पाया अपना राज था। गोरों की सब शर्तें मान के,अब तक हारी बाजी हैं। सबसे बड़ा हैं झूठ जगत का,हमको मिली आजादी हैं। सच-सच क्यो नही कहते साहब देश की ये बर्बादी हैं।                           अनिल कुमार मंडल                       रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

झूठा क्यो इतिहास पढ़ाया

झूठा क्यो इतिहास पढ़ाया, धर्म के नाम पे हमें लड़ाया। देखो हम सच जान चुके हैं, तुमको हम पहचान चुके हैं। भाषा बदली,बोली बदली, गॉव की चनिया,चोली बदली। दाल रोटी जब, खाते थे हम, सबको गले लगाते थे हम। ऐसा भारत देश था अपना, अब जो मेरा बना हैं सपना। वही व्यवस्था गुरुकुल वाली, फिर से मुझको लानी हैं। वीर शहीदों के सपनों को, सच करने की ठानी हैं। संविधान में हो संसोधन, अब तक जो बईमानी हैं। हम बच्चे थे,हम भोले थे, अब तक हमनें मानी हैं। चिरंतन इतिहास को जाना, फिर हमनें ज़िद ठानी हैं। अंग्रेजी षड्यंत्र रचा कर, की गई कुछ शैतानी हैं। सत्ता मोह लंगोट के कच्चे, नर की भी नादानी हैं। अब जाकर ये जाना हमनें, की गई कुछ मनमानी हैं। युगों-युगों तक गाये दुनिया, जिसकी अमर कहानी हो। उस भारत का सृजन करें, दुनिया जिसकी दीवानी हो। बच्चा-बच्चा चन्द्रगुप्त गुरू में कौटिल्य की वाणी हो। बहने होवे झांसी रानी, जिनकी अमर कहानी हो। मौत हथेली रखने वाला, हर युवा बलिदानी हो।            अनिल कुमार मंडल         रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

संविधान बनवाने दो

बहुविधान को छोड़ो साथी, संविधान बनवाने दो । सात लाख बत्तीश हज़ार के,  सपनें मुझे सजाने दो । तथा कथित आज़ादी पायी,  पूर्ण स्वराज तो लाने दो । सत्ता का बस लेन-देन हुआ,  सबको अब समझाने दो । कुछ लोगों ने किया कलंकित,  काली घटा हटाने दो । माना थे सत्ता के लालची,  बीती बातें जाने दो । कानून से हुए तिलक जी घायल,  नामो निशाँ मिटाने दो । सुखदेव,भगत को कहे आतंकी,  जड़ से उसे मिटाने दो । इंडिया से अब पीड़ित हुए हम,  भारत मुझको बनवाने दो । जहाँ पे गुरू और गुरुकुल छूटा,  वही व्यवस्था लाने दो । मैकॉले के पुत्र जो टोके,  हिंदी में समझाने दो । जाति,धर्म से ऊपर उठकर  मानव मुझे बानाने दो । अटल सत्य अंतक जो आये,  साथ चलू कुछ पाने दो । क्षमा,दया,करुणा से लथपथ,  फिर से देश साजने दो । वैतरणी से सब तर जाए,  ऐसा कुछ कर जाने दो । हर एक जन्म का काम यह हो, भोला से वर पाने दो । सात लाख बत्तीश हज़ार के  सपनें मुझे साजने दो । बहुविधान को छोड़ो साथी,  संविधान बनबाने दो ।