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चलो रे दिल्ली

माहे सावन चलो रे दिल्ली,नेक कर्म कर जाए। सो रहे देखो देश की जनता,उनको चलो जगाए। तथाकथित आजादी जी रहे,2पूर्ण स्वराज को लाए। संविधान में परिवर्तन कर,नूतन राष्ट्र बनाए। माहे सावन चलो रे दिल्ली,नेक कर्म कर जाए। भटके जो युवान देश के,2 उनको राह दिखाए। गांधी,नेहरू के पथ चलकर,हमनें बहुत गवाए। एक बार बाबू सुभाष के,2 पथ को गले लगाए। माहे सावन चलो रे दिल्ली,नेक कर्म कर जाए। जीवन आनी जानी छाया,फिर काहे भय खाए। भगत बने या वीर कुंवर सिंह,2 दोनों में सुख पाए। माहे सावन चलो रे दिल्ली,नेक कर्म कर जाए। दिल्ली माने या न माने,2 अपना फर्ज निभाए। तन,मन,धन, जीवन अर्पित कर,नूतन राष्ट्र बनाए। माहे सावन चलो रे दिल्ली,नेक कर्म कर जाए।             अनिल कुमार मंडल         रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

एक दिन बाबा वीर भगत

एक दिन बाबा वीर भगत, सपनों में मेरे आये थे हिंद की व्यथा बताया और सोते से हमें जगाये थे इस मिट्टी का कर्ज हैं मुझपे ये समझाने आये थे ये मुश्किल मानव तन का उद्देश बताने आये थे लघु जीवन में पा जाए सम्मान सिखाने आये थे एक दिन बाबा वीर भगत, सपनों में मेरे आये थे कुछ भारत के लोग यहाँ,गोरों से ज्यादा काले थे तन था देशी पर नियत से ये तो गंदे नाले थे कुछ ऐसे भी हुए सपूत जो भारत के मतवाले थे दोनों की कथा सुना के वो स्वराज सिखाने आये थे एक दिन बाबा वीर भगत, सपनों में मेरे आये थे गद्दारों को नहीं बकसना ये भी कहने आये थे अंग्रेजी में उलझा भारत मात बचाने आये थे स्वदेशी का मंत्र दिया हमको समझाने आये थे एक दिन बाबा वीर भगत, सपनों में मेरे आये थे हिंद की व्यथा बताया और सोते से हमें जगाये थे                     अनिल कुमार मंडल                  रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

वीर पुत्र बलिदानी

 1*) चिंतन कर ले देश धर्म की,बहे आंखों से पानी। पानी आँख का रूक न जाये,गढ़ दो नई कहानी। हे! वीर पुत्र बलिदानी,जागो भारत स्वाभिमानी। देश फंसा वैश्विक बंधन में,हो गई कुछ नादानी। धर्म की बातें युवाओं को, लगने लगी पुरानी। हे! वीर पुत्र बलिदानी,जागो भारत स्वाभिमानी। शास्त्र पढ़ाओ देश बचे,शस्त्रों की बोलो वाणी। देश धर्म दोनों की जय हो,होगी अमर कहानी। हे! वीर पुत्र बलिदानी,जागो भारत स्वाभिमानी।                        *********** 2*)वो जुवां कहाँ सच बोलेगी, ईमान बेच जो लुच्चे हैं। सच को सच कहने वाला जिगर,इस शहर में ईके-दुक्के हैं। दासी है ये नेताओं की, सेठों के खनकते सिक्कें हैं। खबरों को ऐसे ढालते हैं, की खुदा भी हक्के-बक्के हैं।                      ************* 3*)जाती,मजहब लड़ते देश में,मामला रहता गर्म। अंतक के आने से पहले,कर लो एक सत्कर्म। शास्त्र उठाओ राष्ट्र बचेगा, शस्त्र संभलो धर्म। बच्चे जाने राष्ट्रधर्म को, दे देना ये मर्म। हम जो अपना कर्म करें, वो करेंगे अपना कर्म। कु...

आईना सच बोलता हैं

जुवां नहीं इसकी मगर ये आईना सच बोलता हैं जो हैं जैसा जीव देखो हू-ब-हू ये तोलता हैं। सामने आये परिंदा या कपि कोई रूप ले, या कोई निर्धन हो आया,या जगत का भूप ले। जो हो जैसा उसको वैसा रूप ये दिखलाएगी। इसके टुकड़े-टुकड़े कर दो सच से न डर पायेगी। आईना निर्जीव हैं ये मुख कभी न खोलता हैं। बेजुवां में हैं जुवां जो झूठ कुछ न बोलता है। जो हो जैसा उसको ये तो हू-ब-हू ही तोलता हैं, जुवां नहीं इसकी मगर ये आईना सच बोलता हैं।          अनिल कुमार मंडल      रेल चालक /ग़ाज़ियाबाद

प्रणय कलह का खेल

चलो सजन हम तुम करते हैं,ऐसी एक शुरुआत जी, प्रणय कलह का खेल बनाकर खेलेंगे दिन-रात जी। एक दूजे को छुए बिना, नैनों से होगी बात जी, जिसकी पलकें झुकेगी पहले,उसकी होगी मात जी। चाहे कोई बने विजेता,करूंगी मैं शुरूआत जी, तुम मुझको न छेड़ोगे कभी,मैं छेड़ूँ दिन-रात जी। चलो सजन हम तुम करते हैं,ऐसी एक शुरुआत जी, प्रणय कलह का खेल बनाकर खेलेंगे दिन-रात जी। पतझड़ का मौसम हो या हो,भादों की बरसात जी,  खेल हमारा चले निरंतर, समझो तुम हालात जी प्रीत भरी इस खेल में देखो,पाएंगे सौगात जी, तेरा-मेरा रहे न कोई,अपनी ये जज़्बात जी। चलो सजन हम तुम करते हैं,ऐसी एक शुरुआत जी, प्रणय कलह का खेल बनाकर खेलेंगे दिन-रात जी।                                      अनिल कुमार मंडल                                  रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

ठगी गई हैं देश की जनता

ठगी गई हैं देश की जनता,ठगे गए श्री राम जी। ठगी गई हैं गंगा मैया,ठगे गए ईमाम जी फिर भी जनता नही जागती,मन से हुए गुलाम जी। तथाकथित नेता जी देखो,कर रहे हैं विश्राम जी। ठगी गई हैं देश की जनता,ठगे गए श्री राम जी। एक-एक करके देश बिक रहा,लग रहा सबका दाम जी। जंगल बिक गए,पर्वत बिक गए,बिक गए देखो धाम जी। नौकरी गूलर फूल हुए,शिक्षा पे लगा विराम जी। ठगी गई हैं देश की जनता,ठगे गए श्री राम जी। निर्धन,भूखे बढ़ते देश में, इसका नूतन नाम जी। इसी को कहते हैं विकास, रोटी पे हो संग्राम जी। मीडिया भी दासी इनकी हैं जपते सुबहों शाम जी। ठगी गई हैं देश की जनता,ठगे गए श्री राम जी। मन की गुलामी से निकले तो,थोपेंगे इलजाम जी। वीरों की ऐतहासिक धरती,हो रही हैं नीलम जी। वैश्विक बंधन तोड़े भारत,कर्ज का छोड़े जाम जी। अब न कोई चाणक्य आकर, करेंगे कोई काम जी। खुद ही हमको दृढ़ निश्चय ले,करना हैं कुछ काम जी। ठगी गई हैं देश की जनता,ठगे गए श्री राम जी। ठगी गई हैं गंगा मैया,ठगे गए ईमाम जी।                         अनिल कुमार मंडल             ...

संभलो हिन्द के वासी

 हर एक चौक चौराहे पर,  ऑक्सीजन बिकने वाला हैं। संभलो हिन्द के बासी संभलो,  सब कुछ गड़बड़ झाला हैं। विश्व के सत्ता धारी ने, भारत में नेता पाला हैं। कोई पार्टी हो सत्ता में, कुछ नहीं करने वाला हैं। संभलो हिन्द के बासी संभलो,  सब कुछ गड़बड़ झाला हैं। कोरोना के नाम पे देखों, देश ये लूटने वाला हैं। जो इस साजिश को समझेगा, बस वहीं बचने वाला हैं। हर एक चौक, चौराहे पर, ऑक्सीजन बिकने वाला है। संभलो हिन्द के बासी संभलो,  सब कुछ गड़बड़ झाला हैं। गलत टेस्ट हैं,झूठा वैक्सीन, मौत ये देने वाला हैं। चेहरे पे पर्दे लगवाकर, रोग ये देने वाला हैं। संभलो हिन्द के बासी संभलो,  सब कुछ गड़बड़ झाला हैं। लोगों अब सड़कों पे आओ, फिर कुछ होने वाला हैं। मीडिया भी सब बिके हुए हैं, सब के मुख पर ताला हैं। संभलो हिन्द के बासी संभलो, सब कुछ गड़बड़ झाला हैं। हर एक चौक चौराहे पर, ऑक्सीजन बिकने वाला हैं।         अनिल कुमार मंडल       रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

कोरोना का शोर

 बंद करें हम आना जाना,कोरोना का मचा हैं शोर। तुम भी बैठे अपने घर में,हम भी बैठे अपने ठौर। मास्क लगाओ,दो गज दूरी,कहते हो गुजरे ये दौर। स्कूल बंद,दुकानें बंद हैं,मयखाने पे क्यो हैं शोर। तुम भी बैठे अपने घर में,हम भी बैठे अपने ठौर। बंद करें हम आना जाना,कोरोना का मचा हैं शोर। जीव,जन्तु सब भूखे प्यासे,जंगल में न नाचे मोर। जिनके घर में रोज़ी-रोटी,वो खाते अखरोट को फोड़। निर्धन सब रोटी को तरसे,भूख ने दिया उसे झकझोर। तुम भी बैठे अपने घर में,हम भी बैठे अपने ठौर। बंद करें हम आना जाना,कोरोना का मचा हैं शोर। उनकी भी तो सोंचो साहब,जिनके सपने थे चितचोर। तुम हो बाबू एoसीoवाले,हम थे मेहनतकश जी तोड़। घर बैठे भी लगी बीमारी,कैसा हैं जीवन में मोड़। तुम भी बैठे अपने घर में,हम भी बैठे अपने ठौर। बंद करें हम आना जाना,कोरोना का मचा हैं शोर। एक बीमारी से बचने में,बहुरोगों से तन कमजोर। विनती आपसे हमसब करते,बंद करा दो अब ये शोर। मेहनतकश कोई घर न बैठे,सुनकर कोरोना का शोर। बंद न हो कही आना जाना,खुशहाली फैले चहु ओर।2                             ...

तुम्हारी चाहत

 देखो कैसा हाल हुआ हैं, सनम तुम्हारी चाहत में। डरा-डरा सा मैं रहता हूँ, दिन बीते घबराहट में। जद्दोजहद कर तुझको पाया, माँ,बापू से जा टकराया। उल्फत में भी हुई लड़ाई, लड़ बैठे दो सगे से भाई। तेरा-मेरा जुड़ा हैं रिश्ता,  रिश्तों की गरमाहट में। देखो कैसा हाल हुआ हैं, सनम तुम्हारी चाहत में। डरा-डरा सा मैं रहता हूँ, दिन बीते घबराहट में। देख सनम मुझे सजा न देना, अपने इश्क को क़ज़ा न देना। सोच-सोच कर डर जाते हैं, हिज्र की हल्की आहट में। डरा-डरा सा में रहता हूँ, दिन बीते घबराहट में। देखो कैसा हाल हुआ हैं, सनम तुम्हारी चाहत में। डरा-डरा सा मैं रहता हूँ, दिन बीते घबराहट में।                                 अनिल कुमार मंडल                                      रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद

तेरे दुःख हर लेंगे राम

निर्धन का दुःख हरने वाले,तेरे दुःख हर लेंगे राम। राम लल्ला है सब दुःख हर्ता,पहुँचाये बैकुंठ के धाम। सत्य सनातन धर्म हैं कहता,कर बंदे नेकी का काम। निर्धन का दुःख हरने वाले,तेरे दुःख हर लेंगे राम। ये मानव तन पाया हमनें, सब जीवों में ये हैं ललाम। निर्धन का दुःख हरने वाले,तेरे दुःख हर लेंगे राम। प्यासे को पानी पिलवाओ,भूखे को रोटी का पान। सद्गुण हो व्यवहार हमारा,सब का कर ले हम सम्मान। निर्धन का दुःख हरने वाले,तेरे दुःख हर लेंगे राम। छल प्रपंच से दूर रहे हम,ईश्वर का भी कर ले ध्यान। भटके हैं जो राही बाट से,दे प्रभु थोड़ा उनको ज्ञान। निर्धन का दुःख हरने वाले,तेरे दुःख हर लेंगे राम।                                    अनिल कुमार मंडल                                 रेल चालक/ग़ाज़ियाबाद