Poem of love:- जीने की तैयारी

           जीने की तैयारी

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जीवन मेरा बीत रहा हैं, जीने की तैयारी में,
हर वक्त बंदा लगा हुआ हैं, रोटी की तैयारी में।
बचपन था, अनमोल खजाना, गुड्डे ,गुड़ियों का था जमाना।
बारिश में वो नंगे नहाना, बाबा के संग खेत पे जाना।
अनमोल वो बचपन पीछे रह गया, खेतों की उस क्यारी में,
जीवन मेरा बीत रहा हैं, लोहे की चार दिवारी में।
हर वक्त बंदा लगा हुआ हैं, रोटी की तैयारी में।

जॉब लगी संगिनी आई, बापू जी ने कर दी सगाई,
नवजीवन ने ली अंगड़ाई, लोगों ने दी खूब बधाई,
मेरे घर एक कन्या आई, जीने का उद्देश्य ले आई,
घर का कोना-कोना खो गया, बेटी की किलकरी में,
नवनिर्मित खुशबू आ बैठी, जीवन के फुलवारी में।
जीवन मेरा बीत रहा हैं, जीने की तैयारी में।

रोटी, कपड़ा और मकान हैं, जरूरत का सामान पड़ा हैं,
लेकिन वैसी नींद कहाँ, जैसी थी, बापू बाड़ी में।
कागज के टुकड़े पकड़ रहे हैं, वक्त की चलती गाड़ी में।
आज का दिन भी निकल गया हैं, कल की ही तैयारी में।
जीवन मेरा बीत रहा हैं, जीने की तैयारी में।
हर वक्त इंसा लगा हुआ हैं, रोटी की तैयारी में।

                                   अनिल कुमार मंडल
                             लोको पायलट/ ग़ाज़ियाबाद


                                                                     
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